
*कांग्रेस की जातीय राजनीति के खिलाफ 7 सितंबर को भाजपा का समरसता-सौहार्द संकल्प धरना: खजान दास *
*हल्द्वानी पर कांग्रेस के पास तथ्य नहीं, इसलिए सड़क पर कर रही राजनीति: भाजपा *
*राहुल गांधी पहले कांग्रेस के भीतर दलित नेताओं के अपमान का हिसाब दें, फिर दूसरों को उपदेश दें: खजान दास*
*देवभूमि की समरस संस्कृति से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं: खजान दास*
*जगजीवन राम से लेकर आज तक कांग्रेस में दलित नेतृत्व के साथ अन्याय*
देहरादून 6 सितंबर 2026। हल्द्वानी प्रकरण को जातीय और राजनीतिक रंग देकर उत्तराखंड की सामाजिक समरसता को प्रभावित करने के कांग्रेस के प्रयासों के विरोध में भारतीय जनता पार्टी 7 सितंबर को प्रदेश के सभी जिलों में ‘समरसता-सौहार्द संकल्प धरना’ आयोजित करेगी। भाजपा कार्यकर्ता कांग्रेस की उस राजनीति का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करेंगे, जिसके माध्यम से एक स्थानीय सामाजिक घटना को भाजपा बनाम दलित समाज के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है।
कैबिनेट मंत्री श्री खजान दास ने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड की सामाजिक संस्कृति और सदियों पुरानी समरसतापूर्ण परंपराओं को समझे बिना छुआछूत जैसे गंभीर विषय को राजनीतिक हथियार बनाना कांग्रेस की संकीर्ण राजनीति का प्रमाण है। कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि उत्तराखंड के सामाजिक ताने-बाने को जातीय संघर्ष में बदलने की कोशिश यहां की जनता स्वीकार नहीं करेगी।
श्री खजान दास ने कहा कि कांग्रेस को कल मुख्यमंत्री आवास के घेराव से पहले यह बताना चाहिए कि जब हल्द्वानी की घटना से भाजपा का कोई संबंध ही नहीं है, तो वह मुख्यमंत्री आवास का घेराव किस आधार पर कर रही है। कांग्रेस तथ्यों पर जवाब देने के बजाय सड़क पर राजनीतिक प्रदर्शन के जरिए इस पूरे प्रकरण को और तूल देने की कोशिश कर रही है। जिस घटना से भाजपा का कोई लेना-देना नहीं, उसके लिए मुख्यमंत्री आवास का घेराव करना कांग्रेस की राजनीतिक हताशा को ही दर्शाता है। कांग्रेस को पहले तथ्य स्पष्ट करने चाहिए, फिर राजनीति करनी चाहिए।
श्री खजान दास ने कहा कि राहुल गांधी को दलित सम्मान पर भाषण देने से पहले कांग्रेस के अपने इतिहास और अपने आचरण का हिसाब देना चाहिए। कांग्रेस का दलित प्रेम आखिर चुनाव और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक ही क्यों दिखाई देता है? जब सत्ता और संगठन में वास्तविक हिस्सेदारी की बात आती है, तब कांग्रेस का रवैया क्या रहा है, इसका जवाब कांग्रेस को देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि 1977 में बाबू जगजीवन राम का कांग्रेस से अलग होना हो या कांग्रेस के भीतर दलित नेताओं के साथ सामने आए कथित दुर्व्यवहार के मामले, कांग्रेस की कथनी और करनी में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। यह राजनीतिक घटनाक्रम इस सवाल को जन्म देता है कि दशकों तक कांग्रेस में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने वाले इतने वरिष्ठ दलित नेता को सर्वोच्च नेतृत्व की दौड़ में वह अवसर क्यों नहीं मिला। कांग्रेस सामाजिक न्याय की बात करती रही, लेकिन क्या उसने अपने भीतर दलित नेतृत्व को वास्तविक राजनीतिक अवसर दिया?
श्री खजान दास ने कहा कि कांग्रेस को अपने वर्तमान राजनीतिक आचरण का भी जवाब देना चाहिए। उत्तराखंड में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद कांग्रेस भवन में उनकी तस्वीर के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला सामने आया था। राजस्थान के बीकानेर में टिकट वितरण के विवाद के दौरान कांग्रेस के जिलाध्यक्ष मदन गोपाल मेघवाल के साथ कथित मारपीट का मामला भी सामने आया। उन्होंने कहा कि ऐसे घटनाक्रमों के बीच कांग्रेस का दलित सम्मान का दावा कथनी और करनी के अंतर को सामने लाता है।
उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद एक सामाजिक संस्था से जुड़े दलित युवाओं द्वारा अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए एफआईआर दर्ज कराई गई। कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि जिन दलित युवाओं ने स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हुए कानून का सहारा लिया, उनकी सुरक्षा और अधिकारों को लेकर उसने सार्वजनिक रूप से कितनी चिंता जताई? दलित सुरक्षा केवल राजनीतिक भाषणों का विषय नहीं हो सकती।
कैबिनेट मंत्री ने कहा कि एफआईआर को राजनीतिक प्रतिशोध बताकर वास्तविक मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। किसी भी नागरिक को खतरा महसूस होने पर कानून की शरण लेने का पूरा अधिकार है। जांच एजेंसियां तथ्यों के आधार पर अपना काम करेंगी और राजनीतिक दलों को कानून की प्रक्रिया का सम्मान करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस की राजनीति का पुराना तरीका जाति, धर्म और वोट बैंक के आधार पर समाज को बांटकर राजनीतिक लाभ लेने का रहा है। आज भी वही राजनीति उत्तराखंड जैसे शांतिपूर्ण और समरस समाज में आजमाने की कोशिश की जा रही है। देवभूमि की जनता नफरत और विभाजन की राजनीति नहीं, सामाजिक भाईचारा चाहती है।
श्री खजान दास ने कहा कि कांग्रेस को बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर राजनीति करने से पहले उनके विचारों को अपने राजनीतिक व्यवहार में उतारना चाहिए। समानता, सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों की बात करने वाली कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि उसके राजनीतिक इतिहास और व्यवहार में इन मूल्यों का कितना पालन हुआ है।
उन्होंने कहा कि 7 सितंबर का ‘समरसता-सौहार्द संकल्प धरना’ किसी समाज या वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि समाज को जाति के नाम पर बांटने वाली राजनीति के खिलाफ है। भाजपा का स्पष्ट संकल्प है कि उत्तराखंड की सामाजिक एकता, भाईचारे और समरसता को किसी भी राजनीतिक स्वार्थ के लिए कमजोर नहीं होने दिया जाएगा। कांग्रेस जितना समाज को बांटने का प्रयास करेगी, उत्तराखंड उतनी ही मजबूती से समरसता और सौहार्द के साथ खड़ा होग।


